पल
हाँ, गुज़ारे थे कभी दो-तीन पल कुछ हसीं, कुछ शोख, कुछ रंगीन पल हर तरह की वासना से हीन पल अब कहाँ मिलते हैं वो शालीन पल भोग, लिप्सा, मोह के संगीन पल कब, किसे दे पाए हैं तस्कीन पल आपका आना, ठहरना, लौटना इक मुक़म्मल हादसा थे तीन पल साथ हो तुम तो मुझे लगत...
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चिराग जैन CHIRAG JAIN
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[03 Apr 2009 22:49 PM]



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