मर गईं
चंद सस्ती ख्वाहिशों पर सब लुटाकर मर गईं नेकियाँ ख़ुदगर्जियों के पास आकर मर गईं जिनके दम पर ज़िन्दगी जीते रहे हम उम्र भर अंत में वो ख्वाहिशें भी डबडबाकर मर गईं बदनसीबी, साज़िशें, दुश्वारियाँ, मात-ओ-शिक़स्त जीत की चाहत के आगे कसमसाकर मर गईं मीरो-ग़ालिब...
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चिराग जैन CHIRAG JAIN
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[04 Apr 2009 13:11 PM]



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