चर्चा में..

जनशब्द वक्त बूँदों के उत्सव का था बूँदें इठला रही थी गा रही थीं बूँदें झूम - झूम कर थिरक रही थीं पूरे सवाब में दरख्तों के पोर - पोर को छुआ बूँदों ने माटी ने छक कर स्वाद चखा बूँदों का रात कहर बन आयी थी बूँदे सबेरे चर्चा में बारिश थीं बूँदें नहीं ! - अरविन्द... [पूरी पोस्ट]
writer अरविन्द श्रीवास्तव
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[05 Sep 2009 07:50 AM]

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