JINDAGI
जिंदगी है एक पहेली,न थी सुलझी न सुलझेगीचंद लमहो क़ी ठिठोली, जाने कब तक उलझेगी. जब थे चुनने आशा के फूल. वहा निराशा आई क्यो, सब हो इच्छित इस जीवन मे ऐसी प्रत्याशा आई क्यो. सब है अपना,पर कुछ भी नही, यह बात समझ ना आई क्यो. विश्वास छत्र जो बिखर गया, जो जी...
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radhasaxena
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[05 Jun 2009 01:22 AM]



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