छवि और भय
कह डालने से क्यों डरते हो? क्यों स्थगित करते हो आज को कल पर तब कि जब माँजते थे रकाबियाँ गंदे और सड़े होटल में और देखते थे ख्वाब कि जब होऊँगा कदवान कह जाऊँगा सब कुछ... अब कि जब परछाईं भी बताती है पाँच-फुटा तो हो ही पर अब तुम्हें कह जाने के लिए ताड़-सा क...
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Atmaram Sharma
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[02 Aug 2009 12:02 PM]



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