चाह..........
एक बार और जाल फ़ेंक रे मछेरे, जाने किस मछली में, बंधन की चाह हो।" ( जब 18 साल की थी तब बुद्धिनाथ मिश्र आकाशवाणी छतरपुर की कौन्सर्ट में आए थे , उसी वक्त ये रचना उन्होंने सुनाई थी, तब से उनकी ज़बरदस्त प्रशंसक हूँ .)...
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वन्दना अवस्थी दुबे
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[21 Apr 2009 06:50 AM]



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