जागो मेरे मन अचेतन.... जागो !!
ना असमर्थताओं से ना संभावनाओं से हम घिरे हैं अपनी ही मान्यताओं से ...!! ओढी है चादर ऐसी कि छोटी हो तो काट लें हाथ पैर सर गला अपना ( बाहिर न निकलना चाहिए ) सिकुडन साँस लेने देगी मगर कब तक ? हर कण आज विस्तार चाहता है... पनपता है हर बीज विस्तृत हो पेड़...
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विक्षुब्ध सागर
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[03 Dec 2008 10:46 AM]



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