दौड़...
आजकल तसल्ली को हथेलियों पर मलकर रोज़ अपने चेहरे पर लगा लेता हूँ.. सर्दी जब भी आती है तो खुश्की हो जाती है न.. ज़रा नाज़ुक भी हूँ तो बड़ी जल्दी जाड़ा पकड़ लेता है.. अब भी वो दिन याद आते हैं जब अपने इंजीनियरिंग कालेज के हॉस्टल में कभी कोई बीमार पड़ता थ...
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केतन कनौजिया 'शाइर'
कुछ यूँ ही...
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[17 Sep 2009 04:51 AM]



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