तलाश..
एक बात बताइए.. कभी खुदा को देखा है किसी ने.. फिर क्यूँ हर सहर ये सजदा करते हैं हम.. क्यूँ हम इस पत्थर की मूरत को इस कायनात की सबसे अज़ीम ताकत समझते हैं.. अगर मैं ये पूछूँ के खुदा को मुतैयाँ करें तो शायद कोई तौज़ीह देना बड़ा पेचीदा काम होगा.. मैंने न...
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केतन कनौजिया 'शाइर'
कुछ यूँ ही...
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[17 Sep 2009 04:49 AM]



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