दौलत
आज भी किसी अधूरी शाम को जो एक किनारे बैठकर हिसाब करता हूँ.. जो ज़िन्दगी के बहीखाते में कुछ कर्ज़े ही बाकी दिखाई देते हैं.. कभी कभी लगता है के या तो हिसाब करना मुझे आया नहीं.. या फिर तजुर्बों की रफ़्तार से ज्यादा तेजी इस हिसाब की है.. गुलज़ार साहब की...
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केतन कनौजिया 'शाइर'
कुछ यूँ ही...
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[17 Sep 2009 04:48 AM]



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