जड़ो से खेलने की सज़ा है..
एक बार देखा एक पेड़ को, ज़मीन पर उल्टा वो पड़ा था.. जड़ें थी हवा में झूल रहीं, शाखों के सहारे वो खडा था.. ' ' झूमे था खुले चमन में वो, मस्तियाँ ही मस्तियाँ चढ़ी थी.. मिली थी आज़ादी ज़मीं से आज, इस बात की ख़ुशी भी बड़ी थी.. ' ' परिंदे रहे थे पूछ.. उसस...
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केतन कनौजिया 'शाइर'
कुछ यूँ ही...
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[17 Sep 2009 05:04 AM]



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