भीत कपोत

मेरी रचनाऍ मौन क्लान्त विश्रान्त तरू ये भीगे - भीगे लम्बी सड़कों का दूर कहीं पर खो जाना तूफानों का दो हाथों के मध्य गुजरना कदमों का बरबस ही थमना , चलना फिर थमना अंगारों को मुठ्ठी में लेना और झुलसना पीड़ा को स्वर न देना पर बिलखना ताका करता है आखों में बैठा एक भी... [पूरी पोस्ट]
writer विपिन बिहारी गोयल
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[29 Aug 2009 13:16 PM]

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