तुम मेरी क्या हो
मैं आज बेसाख्ता मैं अपने से पूँछ बैठा कि तुम मेरी क्या हो मेरा दिल का सकून मेरी आखों की नींद मेरी जुबाँ पर हर वक्त तेरा जिक्र कानों में गूँजती तेरी हँसी तेरे कदमों की आहट तेरी किसी बात को याद करके मुस्करा जाना और फिर निगाहों का दूर कहीं खो जाना कभी त...
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विपिन बिहारी गोयल
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[29 Aug 2009 13:13 PM]



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