एक दिन

मेरी रचनाऍ एक दिन सुबह सूरज नहीं उगा हम बिस्तरों में कसमसाते हुए उसके उगने का इन्तजार करने लगे पर वह नहीं उगा । घीरे -घीरे हमारी बैचेनी बढ़ने लगी अँधेरे आँखों को चुभने लगे हम भाग कर सड़कों पर आ गये हजारों की तादाद में लोग भाग रहे थे चीख रहे थे सूरज के उगने की प... [पूरी पोस्ट]
writer विपिन बिहारी गोयल
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[07 Sep 2009 03:58 AM]

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