तुम्हारे बोल
तिलमिला जाता हूँ मैं हद कर देती हो क्या शर्तों पर जीवन जीने लगूँ या मान लूँ कि मेरा कोई अस्तित्व नहीं, बिन तुम्हारी सहमति के क्या चाहती हो तुम मैं कहता हूँ वो तुम मानती नहीं तुम कहती हो कि तुम जानती नहीं कोई तो रास्ता होगा..... सोचो न!!! बताओ न!!! मै...
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साधवी
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[20 Oct 2007 21:05 PM]



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