मेरी पनीली आँखें…
कभी कुछ ख्वाब पलते थे मेरी इन पनीली आँखों में. डूब कर वो उतरता था… खो जाता था दूर… कहीं बहुत गहरे.. मैं डर जाती.. वो हंस देता मैं रो देती.. आँसूओं के संग संग मानो वो भी निकल आता मेरे आँसू पोंछता प्यार से गाल थपथपाता और कहता, ‘ऐ पगली’ एकाएक जाने कहाँ...
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साधवी
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[20 Feb 2008 01:50 AM]



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