मोहल्ला और कविता
कुंठा से मन कडुवाया.. शब्दों ने आकार लिया.. ओह! शायद कविता रच गई.. अब कुछ गोड़ पसार लें.. तम्बाखू खंगार लें.. मोहल्ले के नुक्कड़ वाली पनवाड़ी की दुकान पर शाम को बतियायेंगे इस कविता को सुनायेंगे... मोहल्ले के तो हम मुन्नु हैं कौन बूझता है हमारा कवि वा...
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साधवी
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[17 Jul 2008 22:26 PM]



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