मोहल्ला और कविता

साधवी कुंठा से मन कडुवाया.. शब्दों ने आकार लिया.. ओह! शायद कविता रच गई.. अब कुछ गोड़ पसार लें.. तम्बाखू खंगार लें.. मोहल्ले के नुक्कड़ वाली पनवाड़ी की दुकान पर शाम को बतियायेंगे इस कविता को सुनायेंगे... मोहल्ले के तो हम मुन्नु हैं कौन बूझता है हमारा कवि वा... [पूरी पोस्ट]
writer साधवी
views
16
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
0
[17 Jul 2008 22:26 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix