साँस की लूट
दो मुक्तक प्रस्तुत कर रही हूँ. -१- लिख रहे हैं जिन्दगी के रुप को रोज होती सांस की इस लूट को देखते ही देखते सब चुक गया ढो रहे हैं हड्डियों के ठूंठ को. -२- देखती हूँ रोज अपने राम को और उसमें ही बसे रहमान को बांटते हैं धरम के जो नाम पर क्या सजा दें आज उ...
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साधवी
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[30 Sep 2008 09:40 AM]



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