ऐसा नया साल हो!

shahroz  ka rachnasansaar समय खुशियों का नहीं , सो इक निवेदन अवश्य है, बक़ौल शकील शम्सी : गुल कर गए कितने ही चरागों को धमाके मुमकिन हो तो इस साल चरागाँ नहीं करना हैं खून से रंगीन हर इक शहर की गलियाँ इस दौर में तुम जश्न का सामां नहीं करना लेकिन हम भारतीय जन्मजात उत्सव-धर्मी हैं... [पूरी पोस्ट]
writer शहरोज़
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[31 Dec 2008 11:04 AM]

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