निदा फाज़ली

मेरा देश मेरा गाँव उसके दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा वो भी मेरी ही तरह शहर में तनहा होगा इतना सच बोल कि होटों का तबस्सुम न बुझे रोशनी ख़त्म न कर आगे अंधेरा होगा प्यास जिस नहर से टकराई वो बंजर निकली जिसको पीछे कहीं छोड़ आए वो दरिया होगा एक महफ़िल में कई महफिलें होती है... [पूरी पोस्ट]
writer sweet_dream
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[29 Aug 2009 13:40 PM]

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