ये इन्कलाब गुज़र जाने दो !
उमेश पाठक ये इन्कलाब गुज़र जाने दो ! चढा सैलाब उतर जाने दो! प्यास बुझती नही मैखानों में , तुम अपनी यादों के पैमाने दो! दार पर मुझको चढा दो यारो, नाम कुछ इश्क में कर जाने दो! उनसे मिलने की तमन्ना है जवां लगी है आस ,मगर जाने दो ! अपने बारे में कभी सोचे...
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Umesh Pathak / उमेश पाठक
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[02 May 2009 21:38 PM]



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