गोश्त बस

sandhya gupta वह काला चील्ह...!! क्या तुमने देखा नहीं उसे... जाना नहीं...?? है बस काला... सर से पाँव तक... फैलाये अपने बीभत्स पंख काले शून्य में मंडराता रहता है इधर-उधर गोश्त की आस में आँखों को मटमटाता अवसर की ताक में.... चाहिये उसे गोश्त बस ....लबालब खून से भरा न... [पूरी पोस्ट]
writer sandhyagupta
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[29 Nov 2008 07:34 AM]

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