बारिश और सरगम
मानसून की तेज़ बौछारों ने मेर गहरी तंद्रा तोड़ी और मैं फिर से आज लिखने के इरादे से बैठा हूँ. क्या लिखूं ये नही पता, बस अनमने से मुसाफिर की तरह चलते ही जा रहा हूँ. बाहर बारिश की फुहारें अपने चरम पर है, जैसे उसे कोई जल्दी है, कोई उसकी राह देख रहा है. इ...
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vikas pandey
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[18 Jun 2008 07:39 AM]



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