दो जुन की रोटी
किस्मत से भीढ़ लेंगे ऐसा सोचता था , लड़ के दुनिया से जी लेंगे ऐसा सोचता था , किस्मत की तरह जिन्दगी भी रूठ गयी कुछ मुस्कुराहट थी चेहरे पर वह भी ले गयी घर वालों ने बहुत पढ़ाया, कुछ कमा खाने लायक बनाया , पर हमने पता नहीं कितनी इक्षायें जगाई, फालतू के खुश...
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mere shabd
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[04 Jul 2009 16:00 PM]



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