न जाने क्यों पीता हूँ ..

Avanish Gautam सिगरेट की तरह उँगलिओं में फंसा तुम्हारा नाम सुलगता है हर कश के साथ जलता है जिगर और चढता है नशा सारे कमरे में भर जाती हो जब धुँए की तरह तुम तब मिलता है सुकून हर सांस के साथ आती जाती हो तुम जानता हूँ यह धुँआ धोखा है हाथ नहीं आएगा फिर भी न जाने क्यों पी... [पूरी पोस्ट]
writer Avanish Gautam
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[19 Sep 2008 07:01 AM]

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