आखिर मैं दिवाली मनाता कैसे
धमाकों ने देश हिलाया नदियों ने भी कहर ढाया न जाने कितने अनाथ हुए और कितने मांगे उजड़ गईं उन उजड़ी मांगो के सामने पूजा कर तिलक लगाता कैसे आखिर मैं दिवाली मनाता कैसे सहमी हुई साँसों को लिए टूटे सपने टूटी आशायें भरी उन घबराई पथराई सी आँखों को इस आसमान मे...
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Vishal Mishra
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[28 Oct 2008 06:57 AM]



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