बहुत हुआ अब थक चुके हैं..
बहुत हुआ अब थक चुके हैं सच कहूं तो पक चुके हैं रोज-रोज की झिक-झिक से बेकार की खिट-पिट से वही पुराने कायदों से झूठे सब उन वायदों से सच कहूं तो पक चुके हैं बहुत हुआ अब थक चुके हैं काम के झूठे बोझ से बॉस की उस डांट से बंधती-टूटती आस से कभी न बुझती प्या...
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भारत मल्होत्रा
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[15 Jul 2009 09:13 AM]



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