एक भूतपूर्व विद्रोही का आत्म-कथन
दुख तुम्हें भी है, दुख मुझे भी। हम एक ढहे हुए मकान के नीचे दबे हैं। चीख़ निकालना भी मुश्किल है, असम्भव...... हिलना भी। भयानक है बड़े-बड़े ढेरों की पहाड़ियों-नीचे दबे रहना और महसूस करते जाना पसली की टूटी हुई हड्डी। भयँकर है! छाती पर वज़नी टीलों को रखे...
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रंगनाथ सिंह
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[15 Dec 2009 03:44 AM]



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