चांद का मुँह टेढ़ा है

मुक्तिबोध नगर के बीचों-बीच आधी रात--अंधेरे की काली स्याह शिलाओं से बनी हुई भीतों और अहातों के, काँच-टुकड़े जमे हुए ऊँचे-ऊँचे कन्धों पर चांदनी की फैली हुई सँवलायी झालरें। कारखाना--अहाते के उस पार धूम्र मुख चिमनियों के ऊँचे-ऊँचे उद्गार--चिह्नाकार--मीनार मीनारों... [पूरी पोस्ट]
writer रंगनाथ सिंह
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[26 Dec 2009 03:38 AM]

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