गिरीश कारनाड के नाटक तुगलक में हमारा समय और समाज

अपनी बात तुगलक अपने समय और समाज के द्वंद्व और यथार्थ का सम्मोहक रूपक है। कोई समकालीन रचनाकार इतिहास या मिथ को केवल उसकी पुनर्रचना के लिए नहीं उठाता। जब इतिहास या मिथ में कहीं न कहीं वह अपने समय और समाज का साद्श्य पाता है, तभी वह उसे अपनी रचना का विषय बनाता है... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ.माधव हाड़ा
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[22 Jun 2008 22:46 PM]

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