ख्वाहिशें

अपूर्ण १ . सुनती हैं ,बोलती हैं ,हंसती हैं ,रोती हैं बेखौफ,बियाबां में,बस भटकती रहती हैं खाव्हिशें क्यों इतनी अजीब होती हैं ? २. लोग ख्वाहिशों पे क्यों लगाम नहीं बाँधते हमेशा से इनकी उडाने लम्बी हुआ करती हैं चाँद के बाद सूरज पे पहुँच, झुलस पड़ती हैं|... [पूरी पोस्ट]
writer निपुण पाण्डेय
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[03 May 2009 10:57 AM]

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