मुझको ले चल उड़ा..........

अपूर्ण आज सुबह तकरीबन ३ बजे खिड़की पे बैठा हुआ था ......भीनी भीनी सी हवा बह रही थी ...कुछ झकझोर गई मन को और बहुत दिनों बाद कुछ पंक्तियाँ बन गई ...... सोंधी सोंधी हवा, भीनी भीनी हवा, प्यारी प्यारी सी हौले सुनो सरगम गाती हवा, मुझको छूती चले रेशमी सी लगे तार म... [पूरी पोस्ट]
writer निपुण पाण्डेय
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[23 Jun 2009 00:24 AM]

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