पहली वर्षा............

अपूर्ण पवन एक मदमस्त आई मेघ को तब याद आई गगन का अभिमान टूटा धरा को वरदान जैसा प्यासी पड़ी कुम्हला गई थी व्याकुल जमीं ऐसी हुई थी जब मेघ गर्ज़न कर उठे फिर विटप पादप खिल उठे धरा कुछ यूँ मुस्कुराई अमृतमयी जब फुहार आई घनन घन घन मेघ गरजे झिमिर झिम झिम फिर जो बरसे... [पूरी पोस्ट]
writer निपुण पाण्डेय
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[24 Jun 2009 05:20 AM]

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