मिथ्या....

अपूर्ण जग जग घूमा नगरी नगरी माया की ये दुनिया पूरी, आखिर में मैं खुद से बोला चल वापस ये शाम घनेरी| मन तो निश्चल पावन था ये ना समझा था कुछ कुटिलाई, मनभावन जो इसे लगा था उस पथ की थी आस जगाई | पल पल महकी खुशबू आई दूर मरीचिका जब इठलाई, देख उसे तब चंचल मन में लो... [पूरी पोस्ट]
writer निपुण पाण्डेय
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[04 Jul 2009 05:55 AM]

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