साँस लेते बुत..

अपूर्ण इंसान सब जाने कहाँ खोते गए साँस लेते बुत से सब बनते गए ज़िन्दगी के इस सफ़र में मुक्तसर खोजते थे कुछ, औ' खुद खोते गए | घर हुआ करते थे वो एक वक़्त था महल की ख्वाहिश में सब ढहते गए | घनी आबादियाँ वीरां होती रही पत्थरो के मकां बस बनते गए | शहर को किसकी न... [पूरी पोस्ट]
writer निपुण पाण्डेय
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[05 Jul 2009 11:32 AM]

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