ये छपा था....
ये छपा था....http://mohalla.blogspot.com/2007/04/blog-post_10.html लोग चुप रहे। बहसें तमाम हुईं। हम एक मजहब के हुए। जिंदगी आम हुई। मुसलमां होना क्या होता है? ये जानना-समझना केवल फैसलों की छांव में मुश्किल है। दरअसल इस देश की साझा विरासत को जीने के लि...
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Bhavya
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[02 May 2007 08:17 AM]



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