जलेंगे आप जलेंगे हम, जलेगा हमारा चमन
कोलाहल है मचा धरती रही उबल इंसान की फितरत में नहीं है सुधरने का शगल पृथ्वी तप रही है। इंसान को इसकी चिंता नहीं है। हो भी क्यों। उसके घर में एसी है, कूलर है, पंखा है। हिमखण्ड पिघल रहे है। नदियां उफान पर है। पर इंसान क्या करें। उसके घर, पानी है, फ्रिज...
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Bhavya
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[10 May 2007 03:42 AM]



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