मैं और तुम

Tamatar मैं, मैं हूँ और तुम, तुम हो तुम्हारा मन बँधा है तुमसे और मेरा मन तो बँधा है सबसे तुम गुनगुनाते हो तो सुनती हूँ केवल मैं पर मेरी आवाज़ के घुँघरू जब बज उठते हैं अनायास उनकी रुनझुन सुनाई देती है दूर,बहुत दूर अंतर में मन पाता है सहारा और तन को मिलता है वि... [पूरी पोस्ट]
writer डा.मीना अग्रवाल
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[04 Nov 2008 06:22 AM]

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