पहचान
अंदर-अंदर टूटन अंतर में घुटन और मुख पर मुस्कान खुशियाँ लुटाना आदत-सी बन गई है उसकी इसी आशा में इसी प्रत्याशा में कि शायद वो एक दिन आएगा ज़रूर आएगा जो नारी को उसके अस्तित्व की पहचान कराएगा आदर दिलाएगा उसके अंतर की पीड़ा से तिलमिलाएगा समाज और तथाकथित समा...
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डा.मीना अग्रवाल
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[05 Nov 2008 05:14 AM]



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