मुक्तक 22
जो चमक है सो है धन के अंबार की किसको चिंता है अब अपने उद्धार की लड़कियाँ किसलिए बोझ बनने लगीं क्यों ये दूल्हे हुए वस्तु बाज़ार की तुमसे कोमल यह रेशम की चादर नहीं तुमसे बढ़कर तो गहरा समंदर नहीं यों तो पत्नी भी, बेटी भी, बहनें भी हैं माँ से बढ़कर कोई रूप स...
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डा.मीना अग्रवाल
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[06 Nov 2008 05:25 AM]



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