यादें
सजना संबरना फिर सामने शीशे के मुश्कराना, करना बातें अपनें से और फिर शर्म से लजाना। अवसर ढूँढना मुलाकातों के पर सामने कुछ कह न पाना, आए कैसा भी मुबारक दिन कोई शुभकामना संदेश लाना। याद में खोकर किसी की कई -कई रंगोलियाँ सजाना, छोड़ दे रंग भरी यादें तुम्ह...
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Keshav Dayal
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[29 Sep 2008 14:07 PM]



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