ख्वाहिश
मैं आदमी हूँ इतनी सी ख्वाहिश है मेरी , कुछ करूँ कि आदमी से इंसान बन जाऊं मैं . लोगों को यहाँ गिरते देखा है , गिर कर फिर संभलते देखा है , ख्वाहिश है बस इतनी मेरी , नज़रों में अपनी ही न गिर जाऊं मैं . इस जहाँ में , ऐसे भी हैं नेक लोग , जो गिरों को उठात...
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Keshav Dayal
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[27 Sep 2008 14:26 PM]



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