मुझे रात में ख़ुद से ..........
मुझे रात में ख़ुद से बेख़याली दे दे जिससे खूबसूरत मेरी सहर बन जाए या तो पलकों से बहता दरिया सूख जाए या अब बहे तो ज़हर बन जाए सोचता हूँ कहीं से खरीद लूँ वो चीज़ें जिनसे ये दीवारें घर बन जाए नए पौदे दिल की क्यारियों में रोप दो यारों ज़रा और हसीं ये शहर...
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dushyant
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[24 Jun 2008 13:17 PM]



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