अवकाश क्यों नहीं लेते तुम?
खिङकी से देखा तो सूरज डूब रहा था पर्वत में; मैं भागा झटपट उस ओर,सवार हवाओं के रथ में; रोक कहूँगा आज न जाओ,डर लगता है अँधेरे में; आज करो आराम,रुको न कुछ दिन मेरे बसेरे में; कल प्रभात से मैं कह दूँगा,पेट दर्द है लेटे तुम; कभी कभी कुछ ऐसा कह,अवकाश क्यों...
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RUPAK_REWA
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[29 Oct 2008 03:31 AM]



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