दर्द उठे कसके
मेरी मासूमियत मुझसे छीन के क्या मिला तुझे, मेरे लिए गम बीन के फूलों को तूने कांटे बताए हम कांटो पर चलते रहे फूल समझ के । जख्म भी तूने दिये मीठे के मीठे बने रहे इसी में मेरा भला बताते रहे दिखाते रहे जख्म भी क्यों भरता भला जब तुम ही इसे कुरेदत...
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Mahendra
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[22 Jun 2009 02:33 AM]



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