मैं मन्हूष हूं
मैं मन्हूष हूं कोई बदनुमा दाग हूं सारे संसार का लगे कर्जदार हूं सारे दुख - दर्द इस जग के देखो सजा देते मुझे मिल के मैं भुगतूं । पत्थरों की चोट से भी गहरे-गहरे अहसास, सिर आ पड़े ये कहते कर्म (गुमनाम) हूं जैसे कि मैं कोई बेकार वस्तु या बेजान हूं...
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Mahendra
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[21 Jun 2009 11:01 AM]



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