बेपरवाह होकर चलते वही अपनी मंजिल पाते-हिंदी शायरी

मस्तराम का का दर्शन  और साहित्य अपनी इज्जत की खातिर लोग कभी दिखाते हैं दरियादिली तो कभी तंगदिल हो जाते खुशफहमी में जीते हैं सभी इंसान कि दुनियां वाले उनकी तरफ ही देखते है दूसरों की नजरों की परवाह करते अपनी राह से हटा लेते नजर इसलिये चलते चलते ही भटक जाते देखते हैं मस्तराम ‘आवारा’ अ... [पूरी पोस्ट]
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[07 Jun 2008 06:14 AM]

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