ऐसे में कहां जायेंगे यार-हिंदी शायरी

मस्तराम का का दर्शन  और साहित्य कहीं जाति तो कहीं धर्म के झगड़े कहीं भाषा तो कहीं क्षेत्र पर होते लफड़े अपने हृदय में इच्छाओं और कल्पनाओं का बोझ उठाये ढोता आदमी ने उड़ने से पहले ही अपने पर खुद ही कतरे शहर हो गये हैं जैसे युद्ध के मैदान किले बन गये हैं रहने के मकान पत्थर फिर बने लगे... [पूरी पोस्ट]
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[05 Jul 2008 05:42 AM]

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