हिन्दी के साथ भेदभाव जारी है।

सर्वे सुखिनः सन्तु। अंग्रेज गए १९४७ में, लेकिन न तो गुलामी की मानसिकता गई और न ही अंग्रेजियत नहीं गई। न जाने क्यों आज भी भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी से अपने अधिकार मांगने पड़ते हैं। लीजिये पढ़िये कुछ समाचार जो सामान्य समझ से परे हैं।१॰ बंगाल में हिन्दी माध्यम से पढ़ाई तो... [पूरी पोस्ट]
writer मुकेश बंसल
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[26 Jul 2006 04:18 AM]

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