तुम्हारी उड़ान का पंख

या मेरा डर लौटेगा मैं मिलूंगा भीड़ में फीके, रंग उड़े और रंग-बिरंगे चेहरों के बीच पहचान वाली पगडंडियों पर मैं जहां भी हूं, दूर तुमसे, दूर सबसे दूर अपने को छिपा रखने के कई रोगों से मैं जा रहा हूं पानी की शक्ल में बुलबुला होता हुआ हवा के आकार में बनता-बिगड़ता पर मिलूंगा... [पूरी पोस्ट]
writer Pawan Nishant
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[19 Oct 2008 03:48 AM]

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